Sunday, 12 July 2015

दिल भी साला बड़ा नाटकबाज़ था

चाहे सर्दियां हुआ करें या बरसाते या गर्मी. मम्मी ठीक सुबह के चार बजे उठा दिया करतीं. और दिल उस खिड़की पर लटका बस पाँच की सुई के टनटनाने की प्रतीक्षा किया करता. आँखें कभी उन्हीं दोहराए हुए पाठों को देखा करतीं तो कभी उस रास्ते को जिस पर से वो साइकिल हाथ में थामे एक एक कदम आगे बढ़ाते हुए चलती आती. तब दिल, मन, होशो हवास जो कुछ भी और जितना भी होता है सब उसी पर अटक जाता. आँखें उसे देखकर भी जी न भर पातीं. और कानों में उसके क़दमों की पदचाप किसी संगीत सी बजती रहती.
वो अपना देखकर भी देखना न जताती. जब मेरी खिड़की पार हो जाती तब वो साइकिल के पैडल को चलाती और फिर यही प्रक्रिया हर नए दिन में रोज़ की तरह ही दोहराई जाती.

शाम को वो अपनी छत पर पानी की टंकी में पानी देखने का बहाना बना मेरे आँगन में झाँकने आती जहाँ में अपनी फिजिक्स और केमिस्ट्री में डूबा हुआ होना जताता. और एक चोर नज़र से उसे देखता.
वो जाने से पहले कोई एक कंकड़ उठा मुझ पर निशाना बाँधती और हार का हिस्सा उसके खाते में न आये इसलिए चूक जाने पर दूसरा कंकड़ मेरी फिजिक्स की भाप में उड़ा देती.

मन भीतर ही भीतर मुस्कुराता और स्वंय को किसी मंझे हुए कलाकार सा पढाई में डूबा जताता. असल में होता इसका उलट ही था. वो जब डूबती शाम से पहले छत पर दिख न जाती तब तलक दिल घनचक्कर सा बना घूमता. अडोस पड़ोस की छतों पर दिल उछल कूद करता फिरता. और जब वो दिख जाती तो सारी केमिस्ट्री की रिसर्च उसी रोज़ करने में जुट जाता.

दिल भी साला बड़ा नाटकबाज़ था. मोहब्बत में घबराता भी है, शर्माता भी है और फिर बोलने की कहो तो बोलती बंद हो जाती है.

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