Thursday, 18 June 2015

अपने अपने किरदार

उन दिनों कहानियाँ देह में नई ऊष्मा भर दिया करतीं. यूँ लगता कि अभी चार रोज़ छोड़कर जो कहानी छतों पर अम्माँ के मुँह से निकल कर अँधेरे में घुल गयी थी उसने आत्मा में कहीं प्रवेश कर लिया है.
सांसें वहीँ कहीं दो छतों के बीच की मुण्डेर पर लटकी प्रतीत होतीं. वह मनु के बिस्तर पर से होते हुए मुझे छूती.
तब कहानी की राजकुमारी सचमुच की राजकुमारी में तब्दील हो जाती. बिजली के चले जाने और शामों के परास्त हो अँधेरे में तब्दील हो जाने के नफ़ा ही होते. नुक़सान ने कभी उन दिनों ज़ेहन में हाज़िरी नहीं लगायी थी.

और फिर जब उन गर्म बीतती शामों में अम्मा कहतीं कि मुआं कोई गला भी तर करा दे. बस कहने भर की देर हुआ करती कि यही तो होना बचा रह गया था कहानी के बीच में. वो एक इंटरवल जान पड़ता. मोहब्बत तब जीनों से होती हुई ठन्डे घड़े के पानी तक पहुँच जाती.तब लगता कि जून की तपन बहुत सुक़ून भरी होती है. सुबहें तो बड़ी फुरसत से कट जातीं लेकिन दोपहरें उन छतों पर इंतज़ार करती शामों के लिए पल पल टुकड़ों में बितायी जातीं. जब वो चुपके से वजहों और बेवजहों को इकठ्ठा कर ज़ीने की सीढ़ियों को अपना राज़दार बना लेती. होठों की उन निशानियों पर घड़े की मेहरबानियाँ अपनी परतें चढ़ाती चली जातीं.

उसको हर रोज़ दुआएं मिलतीं.

इश्क़ में साथी बनाये नहीं जाते वे तो वक़्त बेवक़्त अपना स्पेस ख़ुद ही खोज़ लेते हैं.(घड़े और ज़ीने के अपने अपने मासूम से अलहदा किरदार थे जो कहानी में खुद ब खुद आ जुड़े)

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