Sunday, 12 July 2015

दिल गया काम से

बोर्ड परीक्षाएं सर पर आ खड़ी हुई थीं और हम मोहब्बत के मैदान में लम्बी छलाँग भर चुके थे. हम मतलब मैं. तब तलक तो ठीक ठीक ये भी नहीं पता था कि लड़की का स्कूली नाम क्या है. और हमारा निकम्मा दिल चरों खाने चित्त हुआ पड़ा था.

वो असल में पहली मोहब्बत के पहले पहल के दिन थे. वो तब पहली दफा सामने की छत पर हमारी नक़ल उतारती हुई दिखी. पहले तो दिल शरमा कर रह गया और जब तक हमने उसे संभालना चाहा वो मोहब्बत की गिरफ्फत में आ चुका था.

वे उतरती जनवरी के दिन थे. सुबहें धुप आने से सुनहरी हो जाया करती थीं. और तब रजाइयों में दुबक पढना दूभर हो जाया करता. छतें तब धूप सेंकने के लिए बड़ी भली लगा करतीं. मन खिसककर छतों पर चढ़ आया करता. पास क़िताबें हुआ करतीं और मैथ की प्रैक्टिस के लिए अधभरा रजिस्टर.नज़रें उन्हीं में गढ़ाये बोर्ड की तैयारी में जुटे रहते.

और तभी उन्हीं दिनों में ये मुआं इश्क हो बैठा. पहली नज़र का प्यार. जैसे पहला बसन्त, जैसे पहली बारिश, सर्दियों की पहली धूप. सब कुछ एकाएक पहला पहला सा हो गया.

और दिल गया काम से. फिर बोर्ड परीक्षाएं टाइम टेबल पर टंगी रहतीं. जब तब वे ही हमें नज़र भर देख लेतीं और मन ही मन कहती कि बच्चू आने दे अपना भी टाइम. सारा इश्क़ कंधे पे लिए घूमोगे.

ये मुई मोहब्बत भी ना, न टाइम देखती और नाहीं इसे क्यू में खड़ा होना होता.

दिल भी साला बड़ा नाटकबाज़ था

चाहे सर्दियां हुआ करें या बरसाते या गर्मी. मम्मी ठीक सुबह के चार बजे उठा दिया करतीं. और दिल उस खिड़की पर लटका बस पाँच की सुई के टनटनाने की प्रतीक्षा किया करता. आँखें कभी उन्हीं दोहराए हुए पाठों को देखा करतीं तो कभी उस रास्ते को जिस पर से वो साइकिल हाथ में थामे एक एक कदम आगे बढ़ाते हुए चलती आती. तब दिल, मन, होशो हवास जो कुछ भी और जितना भी होता है सब उसी पर अटक जाता. आँखें उसे देखकर भी जी न भर पातीं. और कानों में उसके क़दमों की पदचाप किसी संगीत सी बजती रहती.
वो अपना देखकर भी देखना न जताती. जब मेरी खिड़की पार हो जाती तब वो साइकिल के पैडल को चलाती और फिर यही प्रक्रिया हर नए दिन में रोज़ की तरह ही दोहराई जाती.

शाम को वो अपनी छत पर पानी की टंकी में पानी देखने का बहाना बना मेरे आँगन में झाँकने आती जहाँ में अपनी फिजिक्स और केमिस्ट्री में डूबा हुआ होना जताता. और एक चोर नज़र से उसे देखता.
वो जाने से पहले कोई एक कंकड़ उठा मुझ पर निशाना बाँधती और हार का हिस्सा उसके खाते में न आये इसलिए चूक जाने पर दूसरा कंकड़ मेरी फिजिक्स की भाप में उड़ा देती.

मन भीतर ही भीतर मुस्कुराता और स्वंय को किसी मंझे हुए कलाकार सा पढाई में डूबा जताता. असल में होता इसका उलट ही था. वो जब डूबती शाम से पहले छत पर दिख न जाती तब तलक दिल घनचक्कर सा बना घूमता. अडोस पड़ोस की छतों पर दिल उछल कूद करता फिरता. और जब वो दिख जाती तो सारी केमिस्ट्री की रिसर्च उसी रोज़ करने में जुट जाता.

दिल भी साला बड़ा नाटकबाज़ था. मोहब्बत में घबराता भी है, शर्माता भी है और फिर बोलने की कहो तो बोलती बंद हो जाती है.

Thursday, 18 June 2015

अपने अपने किरदार

उन दिनों कहानियाँ देह में नई ऊष्मा भर दिया करतीं. यूँ लगता कि अभी चार रोज़ छोड़कर जो कहानी छतों पर अम्माँ के मुँह से निकल कर अँधेरे में घुल गयी थी उसने आत्मा में कहीं प्रवेश कर लिया है.
सांसें वहीँ कहीं दो छतों के बीच की मुण्डेर पर लटकी प्रतीत होतीं. वह मनु के बिस्तर पर से होते हुए मुझे छूती.
तब कहानी की राजकुमारी सचमुच की राजकुमारी में तब्दील हो जाती. बिजली के चले जाने और शामों के परास्त हो अँधेरे में तब्दील हो जाने के नफ़ा ही होते. नुक़सान ने कभी उन दिनों ज़ेहन में हाज़िरी नहीं लगायी थी.

और फिर जब उन गर्म बीतती शामों में अम्मा कहतीं कि मुआं कोई गला भी तर करा दे. बस कहने भर की देर हुआ करती कि यही तो होना बचा रह गया था कहानी के बीच में. वो एक इंटरवल जान पड़ता. मोहब्बत तब जीनों से होती हुई ठन्डे घड़े के पानी तक पहुँच जाती.तब लगता कि जून की तपन बहुत सुक़ून भरी होती है. सुबहें तो बड़ी फुरसत से कट जातीं लेकिन दोपहरें उन छतों पर इंतज़ार करती शामों के लिए पल पल टुकड़ों में बितायी जातीं. जब वो चुपके से वजहों और बेवजहों को इकठ्ठा कर ज़ीने की सीढ़ियों को अपना राज़दार बना लेती. होठों की उन निशानियों पर घड़े की मेहरबानियाँ अपनी परतें चढ़ाती चली जातीं.

उसको हर रोज़ दुआएं मिलतीं.

इश्क़ में साथी बनाये नहीं जाते वे तो वक़्त बेवक़्त अपना स्पेस ख़ुद ही खोज़ लेते हैं.(घड़े और ज़ीने के अपने अपने मासूम से अलहदा किरदार थे जो कहानी में खुद ब खुद आ जुड़े)

Monday, 1 June 2015

इश्क़ में रंज़िशें भी बड़ी प्यारी कीं.

तब अलीगढ़ आगरे से इत्ता दूर जान पड़ता जैसे कि वो अलीगढ़ नहीं लंदन चली गयीं हों. गयीं हों तो अक्सर अख़्तर ही बोला करता. हालांकि अलीगढ़ से भी अख़्तर का खास रिश्ता था या यूँ कहें कि उसके रिश्तेदार वहाँ बसते थे.
जाने को तो कई कई बार जाने के लिए योजनाएं बनायीं जातीं लेकिन वे हर दफे ही पस्त हो जाया करतीं. एक डर तो हमेशा ये सताया करता कि फलां फूफी या फलां खाला के घर किस तरह से क्या बहाना करके जायेंगे जो की घर को शिकायत न आये. दूसरी दफे ये भी सोचा जाता की हम किसी के यहाँ नहीं जायेंगे हमें तो बस अलीगढ़ ही जाना है और उस पे ये कि किसी रिश्ते वाले ने देख लिया की अरे अख़्तर आप अलीगढ़ क्यों मुँह उठाये चले आये और अगर आये तो आये घर को क्यों न आये. हमने क्या दहलीज़ पर काँटे बोये हैं. और फिर अख़्तर की तो खैर थी ही नहीं हमारी भी धुनाई होती सो अलग.
मोहब्बत किसी जंग सी जान पड़ती. जहाँ आप ही घोड़े और आप ही सवार.

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वे दिन भर छत पर टंगे रहने के दिन हुआ करते. मासूम सा सूरज अपने आँचल को हमारे सर पर आ रखता. गुनगुनी खिली धूप उसके आँगन को रौशन कर देती. सुबहें बड़ी सुस्ती से बीता करती और दिन बड़े नखरे से चढ़ता. जो फूल उसके आँगन में खिला करते उनकी खुशबू दूर तलक छत पर आ बरसती.
और तब दिन को खूब खूब प्रतीक्षाएं करा लेने के बाद, सुबह को देहरी से अलविदा कह छोड़ आ लेने के बाद वो आँगन में चली आती. दिल बस चौराहे पर टंगे घंटे सा जोरों से धड़क उठता. और उसकी दिल पुकारे आ रे आ रे वाली आवाज़ें हमारे कानों में अपना रस घोलने लगती.
मोहब्बत तब हमारे कान पकड़ के उठ्ठक बैठक सा कराती.

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उन बीत जाने वाले बसंती दिनों में हुआ यूँ था या ये कहें कि होना यूँ था. आप चाहे इसे जैसे भी लें किन्तु अब उसे हुआ ही जान लें. अख़्तर की जिस बालकनी में फुर्सत के दिन बिताये जाते थे या कहें कि मोहब्बत के किस्से बनाये जाते थे वहां से उसके आँगन के बीच में मुआं नीम का पेड़ आ जाया करता था. कभी वो उसकी मुस्कराहट छुपा ले जाया करता तो कभी उसका इठलाना. तो बड़ी कोफ़्त होती. मन ख्यालों का पहाड़ खड़ा कर लेता और जिस पर चढ़ हमारा दिल ज़ोरों से चिल्लाता "अबे मोहब्बत के दुश्मन तुझे हाय लगेगी" और वो लहराता बलखाता सा मुस्कुरा उठता. मन करता इस मुएँ दुश्मन का कुछ करना होगा.
इश्क़ में रंज़िशें भी बड़ी प्यारी कीं.

Friday, 22 May 2015

तब मोहब्बत किस्तों में होती सी जान पड़ती

सुबहें तब खुशनुमा हुआ करती, दोपहरें तंग किया करती और शामें रात भर कर ढाँढस. मन किसी कटी पतंग सा उड़ता फिरता यहाँ वहाँ. घड़े भर पानी प्यास बुझाने में नाकामयाब सा दूर से देखा करता हर राहगीर को. और दिल लटक के घूमता फिरता खिड़की पे. 

इश्क़ मौसमी बेरोज़गारी सा लगता. क्योंकि तब नानियों और दादियों के घरों की देहरियां प्रतीक्षा की सुइयां टिकटिकाती. जो भरे पूरे आँगन चहचहाया करते वे छुट्टियां आते ही बेजान हो जाया करते. 

लगता क़ि मोहब्बत ने एक ब्रेक ले लिया हो.
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चन्द मुट्ठी भर दोस्त और आसमान भर दुआयें हुआ करती. नासमझी और मोहब्बत से भरे वे शुरूआती दिन अपने कांधे पर खुशियाँ टांग लाते. बरसाते दूर हुआ करती और तमाम खिले फूल चढ़ चुके होते. बीच में कहीं ठहरा और सुस्ताते क़दमों से बढ़ता सूरज दिनों को बेहद तपा देता. 

सूने पढ़े आंगन और दरवाजों पर ताले प्रतीक्षा की एक लंबी रेखा खींच देते. की देखो तुम इस पार हो और वो उस पार. और उस एक बात को परे धकेल देने के अनेकों प्रयत्न में आ जुड़ती उसकी याद. 

यादें फिर इश्क़ का समंदर हो जाया करती. तब मैं उसमें डूबता उतराता. और फिर किसी एक पल वे मुझे उस खिंची रेखा के इस पार आ धकेलतीं.
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उन्हीं किन्हीं दिनों में जब छुट्टियां मुँह चिढ़ाती सी सामने आ खड़ी होतीं. अख़्तर तब एक बात अक्सर सुना करता कि ये दिल किसी जंग खाये घंटे सा किसी स्कूल में टंगा जान पड़ता है जो लाख बजना चाहे किन्तु स्वंय की भी आवाज़ें भूल गया जान पड़ता है. 

और अख़्तर मियाँ कहते अमाँ यार ये छुट्टियाँ न हुई सरहद पर खड़े दुश्मन हो गए. 

और फिर हम तका करते उस सुबह के सूरज को जो उस आँगन को रौशन कर दे और हमारी सूनी पड़ी बालकनी फिर से आबाद हो जाये. 

मोहब्बत तब किस्तों में की हुई सी लगती.
 

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