Friday, 31 December 2010

अभूले दिन, अभूले चेहरे

उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....

-यह नीम की ही पत्तियाँ झड रही हैं न...
-हाँ, शायद पतझड़ का मौसम है ।
-नहीं ये अँधेरे का मौसम है...लगता है अँधेरा हौले हौले झड़ता हुआ गहरा रहा है ।

तब वो एकपल के लिये मद्धम से मुस्कुरा दी थी...फिर उसने कहा

-कितना अच्छा हो कि हम न कुछ पूँछे और न जाने...अपनी अपनी जिंदगी के जवाब एक दूसरे से न माँगें । दिमाग को इसमें शामिल न करें और उसे जी लें जिसे ये दिल जीना चाहता है ।

तब वो ढेर सारे उसके बाद के खामोश पल कब और कैसे गुजर गये....कहाँ पता चला था
वक़्त जब पहलू बदलता है तो खामोश सा चुपचाप गुजर जाता है ।

तब रात चाँदनी थी । हवा गुनगुनाती सी कानों को छूकर जा रही थी । दिल की आहटें दूजे के दिल तक अपना सन्देश गुपचुप पहुंचा रही थीं ।

तब मैंने उससे कहा था
-लगता है आज पूरे चाँद की रात है !
-नहीं, आज चाँद कुछ अधूरा सा जान पड़ता है...कल पूरे चाँद की रात होगी !
उसकी इस बात पर चाँद उतरकर उसके गुलाबी गाल को थपथपा कर चल दिया था । मैंने मुस्कुराते हुए उस चाँद को जाते देखा...

उसने यूँ ही आहिस्ता से चाँद को जाते देखकर पूँछा
-आपको सपने देखना पसंद है...
-हाँ, बहुत...शायद मुझे उससे ज्यादा पसंद है, सपनों को जमा करना...रंग बिरंगे सपने, खूबसूरत सपने, अपनों के सपने, अपने सपने
-सच !
-हम्म्म्म....मैंने ठंडी साँस भरकर कहा
-क्योंकि जमा किये सपने याद बन जाते हैं और उन सुनहरी जमा यादों को मैं अक्सर थपथपा कर उनका हाल पूँछता हूँ । उन यादों में वो सपने बिलकुल अपने लगते हैं ।

यह कहते हुए मैं खामोश सा हो चला था । वो उस पल बोली थी...
-यादें पवित्र होती हैं...शायद इसी लिये जमा रह जाती हैं

-तब उन गहरी हो सकने वाली यादों को, जिनकी आहटें भी रूहानी संगीत छेड़ती हैं, संवारने के लिये हम एक सफ़र पर चल दिये थे...

उस खामोश फैली हुई चाँदनी में उसके ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और काँपे थे और उसकी पलकें सीपियों की तरह मुंद गयीं थीं...जिस पल दोनों के ओठों के स्पर्श ने उस यादगार गहराए हुए पल को एक खुशनुमा न भूलने वाली याद बना लिया था । खुलती और बंद होती सीपियों का वह संसार एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

Tuesday, 28 December 2010

छत पर उतरती जून की रातें

वे तपती जून के दिन हुआ करते . एकदम थके और बेजान . उन आखिरी दिनों के एक ओर सुलगती दोपहरें हुआ करतीं और दूसरी ओर जुलाई . इनके बीच कूलर एक स्वप्न सा जान पड़ता . जोकि माँ द्वारा बचाई जमा पूँजी और पिताजी के प्लान के बावजूद टलता जाता . हम सीमेंटेड फर्श पर तकिया लगाए छत को ताका करते . और गर्म हवा फैंकते पंखे से चिढ होने लगती .

हम हर दोपहर शाम घिर आने की प्रतीक्षा करते . जब सूरज सुस्ताने चला जायेगा और चाँद उसे मुँह चिढाता सा अपनी ड्यूटी की राह में होगा . बच्चे अपने घरों की देहरी को लाँघते हुए बाहर मैदान में चहकेंगे . कुछ क्रिकेट के लिए टीम बाँटते दिखेंगे, कुछ कंचा-गोली में तल्लीन हो जायेंगे . लड़कियाँ या तो माँ का हाथ बँटा रही होंगी या बैडमिन्टन खेलती दिख जायेंगी . और देखते ही देखते शाम डूबने लगेगी . अँधेरा छतों पर पसर जाएगा और चारों ओर पीले बल्ब टिमटिमाने लगेंगे .

फिर रात छतों और आँगनों में उतर आएगीबत्ती गुल हो जायेगी और आस-पास के घर अँधेरे में दुबक जायेंगेलोग अपनी-अपनी मच्छरदानियाँ तानना प्रारंभ कर देंगेछतों पर बिस्तर लगने लगेंगे और वो पड़ोस की छत को लाँघकर हमारी छत पर जायेगीहम मौन कई क्षणों तक आकाश में चमकते तारों को देखते रहेंगेऔर वो एकाएक कहेगी "तुमने कुछ कहा" और मैं कहूँगा "नहीं तो" ।
-तो कुछ कहो ना
-क्या ?
-कुछ भी, कुछ झूठा-कुछ सच्चा
-तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं झूठ कह रहा हूँ या सच ?
-तुम्हारे शब्दों के स्वर सब कह देते है
-अच्छा
-हाँ
-अच्छा तो बताओ, कि टूटते तारे के बारे में तुम झूठ मानती हो या सच

अँधेरे में वो मुस्कुरा देगी और मुझे ज्ञात हो जाएगा कि वह मुस्कुरायी होगीमैं पुनः उससे कहूँगा-बोलो ना
-क्या ?
-वही जो अभी मैंने पूँछा ?
-"झूठा सच" वो ऐसा कहकर गहरी साँस लेगी
-वो भला क्यों ?
-ऐसा झूठ जिसके सच हो जाने के सब ख्व़ाब बुनते हैं और इस उम्मीद में खुश रहते हैं कि शायद यह कभी सच हो जाए
-मैं मुस्कुरा दूँगा और जानता हूँ कि उसे पता चल जाएगा कि मैं मुस्कुराया हूँ


एक उम्र तक हम कितनी समझदारी की बातें करते हैंफिर दूसरी उम्र पर आकर उनके आदी होने लगते हैं जो जैसी हैंऔर हमें इस बात का एहसास भी नहीं रहता कि हमें उनकी आदत हो चली है

 

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