Saturday, 20 November 2010

उस दफा, उसके जन्मदिन पर

रात की स्तब्धता में घडी की सुइयों का टिकटिकाना ज़ोरों पर है । पिताजी उर्फ़ डैडी फ़ोन वाले कमरे में चहलकदमी कर रहे हैं । और आपके मन का मयूर बार-बार उसी फ़ोन के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है । वे सोच की मुद्रा में अपनी सिगरेट जला लेते हैं . आप जानते हैं कि कम-से-कम सिगरेट के समाप्त होने तक तो वे उसी कमरे में टहलते रहेंगे . और आपको अब अगले पाँच मिनट तक स्वंय को पढाई में तल्लीन जताना होगा .

सिगरेट बुझ गयी है और पिताजी अपने क़दमों के पीछे धुएं के छल्ले छोड़ गए हैं . जैसे वे उनके बाद के पहरेदार हों, किन्तु पहरेदार अपने मालिक के चले जाने पर, कभी ना समाप्त होने वाली, नींद के आगोश में चले जाते हैं .

आप दबे क़दमों से उठते हैं और कमरे में पहुँचते हैं, रिसीवर कानों पर, उंगलियाँ काले बटनों पर और दूसरी और दूर-लम्बे तक जाती घंटी टन-टना रही है . मन की सतह पर भय पसरा हुआ है कि उस और रिसीवर कौन उठाएगा . और उसके पिता की कड़क आवाज़, आपके कानों के परदे फाड़ देने को आतुर है . आप एक भी शब्द कहे बिना रिसीवर पटक देते हैं और उसके पिता को कोसते हैं, यह सोचे बिना कि जो वे न होते तो उनकी खूबसूरत पुत्री उर्फ़ आपकी महबूबा कैसे होती .

आप पुनः नंबर डायल करते हैं, हालांकि आप चाहें तो री-डायल का बटन भी दबा सकते हैं किन्तु आप अपनी काँपती अँगुलियों से भय को दूर छिटक देना चाहते हैं . इस दफा उसकी बहन माँ ने रिसीवर उठाया है . और आपसे कुछ कहते नहीं बन रहा . आपका गला सूख जाता है और शब्द बाहर आने को तरसते हैं किन्तु आप उन्हें पीछे धकेलते हैं और रिसीवर रख देते हैं . आपने उसकी माँ को फ़ोन रखते हुए सुना है कि "कितनी बार कहा है कि कॉलर-आईडी लगवा लीजिए, लेकिन मेरी सुने तब ना" .

और इन सबके मध्य कि आप उनकी सुशील, खूबसूरत, गृह कार्य दक्ष पुत्री और आपकी महबूबा कम गर्ल फ्रैंड को यह नहीं बता पाए कि कल आप उसके शहर में होंगे, क्योंकि आप उसका जन्मदिन किसी भी तरह मनाना चाहते हैं .

क्योंकि तीसरी दफा रिसीवर उठने पर, उनके पिताजी उर्फ़ आपके भविष्य के ससुर, आपको ब्लडी ईडियट की उपाधि दे देते हैं .

आप स्कूल की और से जाने वाले कैम्प का कह और अपने को बुद्धिमान लड़कों की सूची में डालकर, अपनी माँ के भोलेपन का फायदा उठाते हैं और चलते समय उनसे 500 रुपये भी ले लेते हैं . उन्हें इस बात का ज़रा भी संदेह नहीं कि यह उनकी भविष्य की हो सकने वाली पुत्र वधू पर खर्च होने जा रहे हैं .

भोर की सर्द हवा आपके शरीर में सुइयाँ चुभो रही है . आप काँप रहे हैं, दाँत कट-कटा रहे हैं किन्तु हीरो-गीरी के चक्कर में बिना स्वेटर के चले आये हैं . जैसे कि उसके शहर में आप गुनगुनी धूप में, अपने सिर को उसकी गोद में रख, लेटे-लेटे धूप सकेंगे . और आपके आस-पास के सभी पशु-पक्षी आपके प्रेम-प्रदर्शन से लजा जायेंगे .

आप छूट चुकी ट्रेन को दौड़ते हुए पकड़ते हैं और गिरते-गिरते बचते हैं . फिर आप ट्रेन के सही समय पर आ जाने पर, रेलवे विभाग को मन ही मन गाली देते हैं . आप डिब्बे की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे महबूबा से मिलने के तमाम एंगल सोच-सोच कर तीन घंटे बिता देते हैं .

उसके शहर का रेलवे स्टेशन देख कर आपको उस पर बहुत प्यार आता है . आप इस पर भविष्य में कई-कई बार उतरना चाहते हैं . पहले अकेले, फिर उसकी बाँहों में बाहें डाले, फिर अपने एक बच्चे को गोद में लिए जब वोह उंगली दिखाकर पूंछ रहा है कि डैडी देखो वो एरोप्लेन . और आप उसकी नज़रों से एरोप्लेन को उड़ते हुए देख रहे हैं . और आपकी गर्ल फ्रैंड कम भविष्य की पत्नी आप दोनों को डांटते हुए आगे बढ़ने को कह रही है . आप एक ही क्षण में भविष्य के ढेर सारे स्वप्न देख लेते हैं .

उसका शहर सुबह की आँख खोल रहा है . अंगडाई लेते हुए कह रहा है "चैन नहीं है, अरे तुम्हारी महबूबा का जन्म-दिन है तो क्या सारा शहर, सर पर उठा लोगे" . आप कचौड़ी और जलेबी की खुशबू लेते हुए, बच्चों की पीठ पर बस्ता लड़ा देखते हुए, मोटी-मोटी औरतों को टहलकर वजन घटाने का भ्रम पाले हुए देखते हैं .

आप सुबह-सुबह उसके कॉलेज के गेट पर खड़े हो जाते हो और चौकीदार आपको तीन दफा लताड़ चुका है . और चौथी दफा आप उसे सिगरेट पिलाते हुए दोस्ती कर लेते हो . वो आपको अपने गाँव की तमाम कहानियां सुना चुका है किन्तु आप उसे फिर भी यह जाता रहे हो कि आप बिलकुल भी बोर नहीं हुए . आपको उसकी कहानियों में बहुत इंटरेस्ट आ रहा है . वह उत्साहित सुर में न जाने क्या क्या गाये जा रहा है . आपका मन कर रहा है कि आप उसके कान पर दो धरें और कहें कि उसे और कोई काम नहीं सिवाए मेरी जान खाने के . अरे चार सिगरेट पी चुके हो, जाओ अपना काम करो .

आपको प्रतीक्षा की घड़ियाँ सदियों लम्बी लगने लगती हैं और वह प्रतिदिन की अपेक्षा अधिक देर से आई है . आपको देख कर वह अपना नाराज़ होना जताती है कि आपसे एक फ़ोन भी नहीं किया गया . देखो तो रात के बखत कितने तो लोगों के बधाई सन्देश आये . और एक तुम हो कि सोने से फुर्सत हो तब न . आप अब उसे मनाएंगे ये जानते हुए कि आपने कोई गलती नहीं की . वह आपकी कोई बात नहीं सुनेगी लम्बे समय तक . और फिर बहुत देर तक आपके मनाने पर वह मान जाएगी . आप उसको लेकर सिनेमा हॉल की दबी-छुपी सीटों पर बैठे खुसर-पुसर कर रहे हैं . आपके कई प्रयत्नों पर आपके ओंठ उसके ओंठों का स्पर्श करते हैं . और उसके कानों में, सुरीली लय में "आई लव यू" कहते हैं . वह प्रत्युत्तर में आपके गलों को चूम लेती है .

माँ का दिया 500 का नोट और अपना बचाया 500 का नोट आपने कई तरह से खर्च किया है . शाम घिर आई है और वह अपनी देरी होने की बात छेड़ देती है . आप उसे कुछ देर और रुकने का निवेदन करते हैं . कुछ क्षण तक आप उसकी आँखों में स्वंय के लिए प्यार को घुले हुए देखते हैं . आप इस मुलाकात की विदाई पर अंतिम बार गले मिलते हैं . वह आई लव यू कहती हुई जा रही है . आप खड़े-खड़े उसे तब तक देखते रहते हैं, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो जाती . वह अब कहीं नहीं दिखती .

उसके जाने के बाद भी, उसकी महक आपके रोम-रोम में महक रही है . आप गहरी साँस लेते हैं और मन ही मन मुस्कुराते हैं . मुस्कान आपके ओठों पर बिखर गयी है ......




Thursday, 11 November 2010

उन "वैलेंटाइन डे" वाले दिनों में

सर्दियों की गुनगुनी धूप है मैं आँगन में कुर्सी-मेज़ डाले, कैमिस्ट्री की किताब से तमाम गैसों को एक-एक कर के उड़ते देख रहा हूँ रह-रह कर एहसास होता है कि उनकी गंध, मेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गयी है भरोसा हो उठा है कि जाकर परीक्षा में उड़ेल दूँगा

भीतर से माँ आवाज़ देती है "दुकान से 100 ग्राम हींग ले आओ"
-"मैं अभी पढ़ रहा हूँ, बाद में लेकर आऊँगा" मैं तेज़ आवाज़ में कहता हूँ

माँ कुछ नहीं कहती इन दिनों आने वाली बोर्ड परीक्षा के कारण, कोई मुझसे कुछ नहीं कहता जब-तब मेरा एक ही उत्तर होता है "पढ़ रहा हूँ" और सामने वाला उत्तर को टटोलता नहीं, कि सही है या गलत

एक कंकड़ मेरे पास आकर गिरा है किताब में से सिर को उठाकर देखता हूँ वो देखकर मुस्कुरा रही है वो अपनी तीसरी मंजिल की छत पर, हर सुबह टंकी में पानी देखने के बहाने से आती है और हर रोज़ वह यही करती है मन ही मन सोचता हूँ कि उसके फैंके गये कंकडों का संग्रह कर लूँ और उसे किसी रोज़ उपहार में दूँ उसे देते हुए कहूँ "ये देखो तुम्हारे फैंक कर मारे गये फूल" और फिर प्रत्युत्तर में उसका खिलखिलाकर हँसना देखूँ

माँ पिछले कई रोज़ से, उसे अपनी छत से, हमारे आँगन में निहारते हुए देख रही है अभी आँगन में निकल कर आएँगी और कल रोज़ की तरह ही, मुझसे पूँछेंगी "यह लड़की हमारे आँगन की ओर ही क्यों देखती रहती है ?" और मैं प्रत्युत्तर में कहूँगा "मैं क्या जानू ? खुद ही जाकर पूँछ लो ना "

हालांकि उसकी भी बोर्ड परीक्षाएं हैं किन्तु ना जाने क्यों, वह हर रोज़ कंकड़ फैंकने जाती है उसकी माँ अवश्य ही उससे प्रश्न करती होगी "तुझे हर रोज़ पानी की इतनी चिंता क्यों रहती है ?" और वह भी कोई समझदारी वाला उत्तर देती होगी

हम कितने नासमझ थे, जो स्वंय के समझदार होने पर गर्व करते थे

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मैं प्रतिदिन सुबह चार बजे उठ जाता हूँ, प्रारम्भ में अपनी पढाई के कारण और कुछ महीनों बाद उसके कारण वो हर रोज़ पाँच बजे अंग्रेजी का ट्यूशन पढने जाती है और मैं उसे अपनी खुली खिड़की से निहारता हूँ वो एक चोर नज़र से मुझे देखती है और फिर साइकिल के पैडल को देखने लगती है खिड़की पार कर लेने पर, पैडल उसके पाँव का स्पर्श कर पाते हैं

इस पूरे बरस मैं हर हाल में पाँच बजे से पूर्व जागा हूँ पिताजी मेरी इस आदत से खुश हैं और मैं उसकी आदत से माँ मुझे हर रोज़ सही समय पर जगाकर, मेरी सुबह खुशनुमा बना देती है कभी-कभी उसे देखकर, माँ की शक़ की सुई बहुत तेज़ी से घूमने लगती है

उस रोज़ जब मैं खिड़की खोलकर पढ़ रहा था और माँ ने उसे निकलते देख, उससे पूँछा था "किस क्लास में पढ़ती हो ? " उसका गला सूखा हो या ना सूखा हो मैं अवश्य सूख गया था उसके चले जाने पर माँ ने मेरी ओर प्रश्नात्मक निगाहों से देखा था और मैं उत्तरविहीन, अपनी गणित की किताब में उलझा होना जता रहा था

सोचता हूँ कि यदि माँ को बोर्ड परीक्षक बना दिया जाए, तो वे अवश्य ही मेरे हर प्रश्नपत्र में इन्हीं प्रश्नों को रखेंगीं और मेरा रोल नंबर अखबार के किसी भी पन्ने पर नहीं दिखेगा

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मार्च अभी दूर है और बोर्ड के मौसम पर बसंत भारी है लाल-गुलाबी कार्डों की बहार है ख़याल हो आता है कि माँ से कोई बहाना कर कार्ड खरीदने के लिये पैसे माँग लूँ, किन्तु उनके प्रश्न दिन--दिन कठिन होते जा रहे हैं और उसके कंकडों की संख्या अधिक

रात्रि के स्वप्न में संग्रहालय देखा है, जिसमें केवल, उसके कंकड़ और माँ के प्रश्न ही हैं मैं पंक्तिबद्ध होकर उनको देख-सुन मुस्कुरा उठता हूँ बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा है, जिसमें रह-रह कर आवाजें गूँजती है "मैं पढ़ रहा हूँ "

सुबह उठकर, पास के पार्क से, एक गुलाब तोड़ लाया हूँ खिड़की से आती हवा, कानों में रूमानी संगीत बजा रही है साइकिल के चले आने की आवाज़ दूर कहीं से कानों में पहुँचती है दिल ज़ोरों से धड़कने लगा है वो खिड़की के पास पहुँचती जा रही है मैं चुपके से दरवाज़ा खोल बाहर गया हूँ मैं उसके सामने जा खड़ा होता हूँ उसके कदम थम गये हैं मध्य में लम्बी चुप्पी छा गयी है मैं पीठ के पीछे छुपे हाथ को आगे बढाता हूँ वो गुलाब ले, साइकिल के पैडल घुमाती, चुप से चली जाती है

इस बरस भी मैं उससे कुछ ना कह सका......
 

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