Saturday, 30 October 2010

फ़िक्शन

छतों पर चाँदनी पसर जाती । अन्ताक्षरी में दबी-छिपी आवाजें रह-रह कर खनक उठती थीं । कोई सुरीली लय, अपने बाद भी, अपने मीठे होने का एहसास कराती रहती । कही किसी कोने से खुसर-पुसर के फूल झड़ते, तो कहीं दो आँखें चारों दिशाओं में इठलाती फिरतीं । और उन सब के बीच, प्रतीक्षा की घडी की सुईयाँ, मन के कलेजे पर धाँय-धाँय कर रेंगतीं ।

उसके आते ही, अम्मा कहतीं "लो आ गई हमारी बेग़म अख्तर, अब देखते हैं हमें कौन हराता है । और फिर सब अपनी-अपनी मुस्तैदी दिखाते । बाज़ी कभी इधर तो कभी उधर । कभी ये पलड़ा भारी तो कभी वो । किन्तु अंततः जीतती बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु की अम्मा ही । और फिर अगले दिन तक उस बात का हो हल्ला रहता । कुछ चेहरे रूठे रहते तो कुछ कहते "हमें नहीं खेलना, यह मुआँ खेल" या "हमको अभी फुर्सत नहीं, जाओ कह दो अम्मा से" । और अम्मा एक दो दिन बाद सब का हाथ पकड़-पकड़ कर इकठ्ठा करतीं । फिर से वही दौर चल निकलता । हँसना, नाचना और गाना ।

उन्हीं दिनों गर्मियों की छुट्टियों में पहली दफा, उस छत पर एक नई आवाज़ गुनगुनाती है । रूठने वाले चेहरों को अपना मसीहा मिल गया और पहली दफा बेग़म अख्तर हार गयीं । हर रोज़ से ज्यादा शोर सुनाई देता है । चाँदनी में नहायी बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु का चेहरा रौशन हो रहा है । पहली ही मुलाकात और हम उन्हें खफ़ा कर बैठते हैं । अगले चार रोज़ तक वो छत के उस खेल में शामिल नहीं होतीं । हाँ दोपहर की रौशनी में जब तब उनकी और हमारी आँखें टकरा जाती हैं । मालूम होता है, बच्चू तुम तो गए काम से । खुद अपना ही क़त्ल करने की तबियत लिए बैठे हो ।

चार रोज़ बाद उनके ओठों पर मुस्कराहट लौट आती है । छत का मौसम सुधर जाता है । अब चाँदनी अच्छी नहीं लगती । अँधेरे में एक हाथ पर दूसरा हाथ रह-रह कर आता है । शुरू-शुरू में वो अपना हाथ झटक देती है । और फिर एक-दो रोज़ में उनकी आँखों में में शरारत बढ़ गई है । वो अँधेरे का फायदा उठा चिकोटी काट लेती हैं । हम आह, आउच की आवाजें निकालते हैं । कुछ आवाजें खी-खी कर उठती हैं । अम्मा कहती हैं "क्या हुआ ?" । हम टालते हैं कि मच्छर काट रहा है ।

वो दोपहार को छत पर कपडे पसारने आई है । मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ । वो कह रही है "हमारा हाथ छोडो" । हम प्रत्युत्तर में कहते हैं "अगर नहीं छोड़ा तो" । तो "अम्मा...." । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ । "बस डर गए" कहती हुई, खिलखिलाकर चली जाती है ।

अँधेरा घिर आया है । छत पर महफ़िल जमी है । अम्मा आवाज़ देकर उसे बुला रही हैं । नीचे से आवाज़ आ रही है "आ रहे हैं" । सीढ़ियों पर मैं खड़ा हूँ । हमारा आमना-सामना हुआ है । वो आगे को बढ़ने लगती है । हम हाथ पकड़ लेते हैं । वो कुछ नहीं कहती । हम पास खींच लेते हैं । और उसके कानों के पास जाकर कहते हैं "आवाज़ दो फिर भी नहीं छोड़ेंगे" । वो मुस्कुरा उठती है ।

अम्मा की फिर से आवाज़ आ रही है । दो सुरीले ओठ आपस में मोहब्बत कर रहे हैं । जंग बहुत पीछे छूट गई है ।
मन में ख़याल हो उठता है "अम्मा तुम्हारी बेग़म अख्तर तो अब हमारी हुईं"....

Sunday, 17 October 2010

मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

Indradhanushबारिश बीतती तो आसमान उजला-उजला निखर आता । और तब, जब भी आसमान में इन्द्रधनुष को देखता तो जी करता कि इन साहब के कुछ रंग चुराकर पेंटिंग बनाऊँ । तमाम कोशिशों के बावजूद में असफल होता और इन्द्रधनुष मुँह चिढ़ाता सा प्रतीत होता । नानी कहती "अरे बुद्धू, उससे भी कोई रंग चुरा सकता है भला" । मैं नाहक ही पेंटिंग करने का प्रयत्न करता । मैं मासूम उड़ती चिड़िया को देखता, तो मन करता कि इसको पेंटिंग में उतार लूँ । कई बार प्रयत्न करता और हर दफा ही, कभी एक टाँग छोटी हो जाती तो कभी दूसरी लम्बी ।

बचपन में अच्छी पेंटिंग ना कर पाने का दुःख मुझे हमेशा रहता । मेरा पसंदीदा विषय होते हुए भी, मैं उसे कभी अपने हाथों में नहीं उतार सका । और जब तब रूआसा हो जाता । तब नानी मुझे गोद में बिठाकर कहती "ईश्वर हर किसी को कुछ न कुछ हुनर अवश्य देता है । सबसे ज्यादा जरुरी है, उसकी बनायीं हुई सृष्टि को समझाना, उसे महसूस करना ।"

बचपन बीता और साथ ही पेंटिंग का हुनर सीखने की मेरी ख़्वाहिश भी उसके साथ जाती रही । धीमे-धीमे बड़ा हुआ तो कुछ नयी ख्वाहिशों ने जन्म लिया । कुछ साथ रहीं, तो कुछ ने बीच रास्ते ही दम तोड़ दिया ।

अपने बी.एस.सी. के अध्ययन के दिनों में, मैं घर पर ही गणित की ट्यूशन पढाया करता था । तमाम बच्चे सुबह-शाम ग्रुप में मुझसे पढने आया करते । अधिकतर दसवीं और बारहवीं के बच्चे हुआ करते । और सुबह-सुबह ही गली के मोड़ से चहल-पहल प्रारंभ हो जाती । सर जी नमस्ते, सर जी गुड मोर्निंग जैसे लफ्ज़ गली में सुनाई देते । बच्चे तो बच्चे, उनके माता-पिता भी सम्मान की दृष्टि से देखते ।

उन्हीं सर्दियों के दिनों में, नानी का हमारे घर आना हुआ । जब सुबह-सुबह उठीं तो उन्हें वही आवाजें सुनाई दीं । तमाम बच्चों से उनकी बातें हुईं । और जब शाम को मैं बाज़ार गया तो वहाँ से नानी के लिए शौल लेकर आया । रात के वक़्त मैंने उन्हें वो शौल उढाई । कहने लगीं "बड़ा हो गया है, मेरा नन्हाँ सा पेंटर । तुझे याद है, तू बचपन में अच्छी पेंटिंग ना कर पाने पर दुखी होता था ।" उनकी बात पर मैं मुस्कुरा दिया ।

कहती थी ना मैं "ईश्वर सबको कोई न कोई हुनर देता है । तुझे गणित जैसे विषय में उन्होंने अच्छा बनाया और अब देख कितने बच्चे तुझसे पढने आते हैं । तुझे आदर मिलता है, उनका प्यार मिलता है । दुनिया में जो सबसे अधिक कीमती है, वो तुझे बिन माँगे मिल रहा है ।"

नानी की बातें एक बार फिर मुझे बचपन के दिनों में खींच ले गयीं । जहाँ खुले आसमान के नीचे लेटा मैं, इन्द्रधनुष को देख, उसके रंगों से रश्क कर रहा हूँ । और वो अपनी जबान बाहर कर, अपने कानों पर हाथों को हिलाते हुए मुझे चिढ़ा रहा है....

.
* चित्र गूगल से

Friday, 15 October 2010

बचपन की मोहब्बत

उसके गालों पर डिम्पल थे । कितनी क्यूट लगती थी, जब वो हँसती । गुस्सा तो जैसे नाक पर रखा रहता उसके, जब भी मोनिटर-मोनिटर खेलती । हाँ, वो हमारी क्लास की मोनिटर जो थी । और मेरा नन्हा-मुन्ना सा दिल धड़क-धड़क के इतनी आवाजें करता कि बुरा हाल हो जाता ।

जबसे विद फेमिली, वो फ़िल्म देख ली थी, अरे जिसमे वो दोनों कहते थे "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" । और मैं मासूम बहक गया, दोस्ती के चक्कर में । मेरा मासूम दिल, जब भी उसको सामने पाता, बस चारो खाने चित्त हो जाता । जबकि मैं सिर्फ़ पाँचवी क्लास में था । हाँ यारों मेरा दिल क्लीन बोल्ड हो गया....मुझे प्यार हो गया ।

जहाँ पहले मैं, उसके सामने, मैडम से याद ना करके लाने पर मार खाता, वहीँ बाद के दिनों में, अपनी रैपुटेशन सुधारने के लिये पाठ कंठस्थ करके लाता ।
"माँ एक रसगुल्ला और दो न, लंच के लिए"
"अरे तू कब से इतना खाने लगा"
अब उन्हें कौन बताये ? कि ये रसगुल्ला, वो निगार खान के लिये ले जा रहा है । और स्कूल पहुँचकर बामुश्किल, हिम्मत करके, कोई बहाना बनाकर, उसे खिलायेगा ।

मेरे प्यार को बस मैं और मेरा दिल जानता था । तब पता भी नही था कि अपने दिल की बात को जाहिर कैसे करें ? यारों उसके चक्कर में मैं होशियार बच्चों की श्रेणी में आ गया ।

बुजुर्ग कह गए हैं कि "कभी-कभी, अपनी किसी भूल का परिणाम, आपको कैसे भुगतना पड़े, आप नहीं जानते" । मैं भी भूल कर बैठा । अपने साथ बैठने वाले दोस्त को, मैंने अपना राजदार बनाते हुए, अपने दिल की बात कह डाली । और वो कम्बखत, निरा गूण दिमाग निकला । उस बेसुरे से रहा नही गया और उसने मेरी मोहब्बत, जो जवान भी न हो पायी थी, का राग, हमारी ही क्लास में पढने वाली, अपनी बहन को अलाप दिया ।

कुछ दिन तो चैन से कटी । हालाँकि, उसकी बहन के माध्यम से, निगार तक बात पहुँच गई होगी । इतना तो पक्का है । केवल इतना रहा, तब तक तो ठीक था । उस कम्बखत से रहा न गया और मेरे इश्क का बैरी, उसे क़त्ल करने के इरादे से, एक बचपन की नादानी कर बैठा ।

उन साहब ने क्या काम किया ?

हमारी महबूबा की फेयर कोपी पर, जो उसकी बहन के पास थी । उसपे लिख मारा, कि "मैं तुमसे प्यार करता हूँ । आई लव यू निगार, मुझसे शादी करोगी ?"
और उसके नीचे हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में गोद दिया । और यह खबर हमें सीना फुलाकर दी ।

अब हमारी तो कर दी न दुर्दशा । मरता क्या ना करता । चलो कोई बात नहीं । किस्मत से, वो अंतिम पीरियड था । उस दिन तो खैर रही । अब घर पहुँचे....
"क्या हुआ ? काहे चेहरा लटका हुआ है ?" माँ पूँछती है ।
"कुछ नहीं...."
अब उनको क्या बताएं, कि अगली रोज़ हमारी मार पड़ने वाली है ।

मालूम था कि मैडम के हाथों, अगली रोज़ बहुत मार पड़ेगी । पेट दर्द का बहाना बना दिया । खुदा न खास्ता, एन वक्त पर, गाँव से हमारे चचा जान आ गए । वो हमें तीन दिन के लिये, अपने साथ रिश्तेदारों के यहाँ ले गये ।

हम सोच रहे थे, कि चलो अब तक मामला शांत हो चुका होगा । मन में तसल्ली का लड्डू खाते हुए स्कूल गए । पर हमे क्या मालूम था, कि हमारे प्यार की ख़बर, पूरी बगिया में फ़ैल गई है । बच्चा-बच्चा वाकिफ हो चला है । उस ससुरे दोस्त ने बात का बतंगड़ बना दिया था । और सारा इल्जाम हमारे मत्थे मढ़ दिया ।

निगार ने हमारी शिकायत क्लास टीचर से कर दी । जिनसे में सबसे ज्यादा खौफ खाता था । फिर क्या था ? पहले ही पीरियड में, टीचर्स रूम से बुलावा लेकर, निगार और उसकी सहेली आ गयीं "तुम्हे मैडम बुला रही हैं" ।

काटो तो खून नही, जैसी स्थति हो गयी थी हमारी ।

मैडम बोली "ये सब क्या है ? दूध के दाँत ठीक से टूटे नही और प्यार करने चले हो । नेकर पहनना आता है ठीक से ? और ये सब खुरापते कहाँ से सीखी तुमने ?"
मैं चुपचाप एक कोने में खड़ा हूँ । 10-20 डस्टर हाथों पर पड़ते हैं, 5-6 चांटे गाल पर पड़ते हैं । कभी इस गाल पर तो कभी उस गाल पर । कान पकड़ कर उट्ठक-बैठक करवाई गयी ।
"बोलो करोगे अब ये सब"
"नही मैडम" मुँह से आवाज़ निकली ।
"सॉरी बोलो इसको"
"सॉरी निगार"
"बोलो निगार, तुम मेरी बहन हो"
मन में सोचा "ये सब क्या है ? ये तो मैं कतई नही बोलूँगा ।"
बोलो...बोलो...
पर मैं खामोश...

"साँप क्यों सूंघ गया, बोलो निगार मेरी बहन है ।"
"मैं फिर भी खामोश ।"
"अरे नही बोलोगे ।"
"चलो मुर्गा बन जाओ ।"

मैं मुर्गा बन जाता हूँ ।
"तुम ऐसे नही मानोगे, जब ऐसे ही मुर्गा बने रहोगे, तब बोलोगे"

दस मिनट गुजरे, फिर पंद्रह-बीस मिनट हुए । टप-टप, आँखों से आँसू निकलने लगे ।
"मैडम लग रही है"
"हाँ, हाँ, तो और लगेगी । बोलो अभी ।"
मैं फिर भी मौन ।

मेरी महबूबा को दया आ गयी । बोली "मैडम रहने दो, जाने दो, छोड़ दो अब । ये नही बोलेगा ।"

मैडम उठा कर, दो-चार और धरती हैं गाल पर । "आइन्दा फिर से ऐसा किया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई ना होगा ।" मन में सोचा "आपसे बुरा है भी नहीं कोई ।"

मार खायी । सज़ा काटी । किन्तु दिल में सुकून था, कि बहन नही बोला । दिल ही दिल में खुश हो रहा था । बाद में सोचता हूँ । चलो बच गये, महबूबा की नज़र में इज्जत तो रहेगी । भले ही उसके सामने मार खा ली ।

फिर क्या, कुछ दिन गुजरे । मामला शांत हो गया ।

एक दिन लंच टाइम में निगार मेरे पास आकर, अपना लंच बॉक्स आगे करके बोली "ये गुलाब जामुन खाओ । आज मेरी बहन का जन्मदिन है । वही हँसता, खिलखिलाता चेहरा और गालों के डिम्पल देख, मन प्रसन्न हो गया । मैंने गुलाब जामुन खा लिया ।

फिर ज्यादातर समय वो मेरे पास आती और मुझे कुछ न कुछ खाने को देती । जब कभी मेरा काम पूरा न होता तो अपनी होम वर्क की कॉपी भी शेयर करती । मैं मन ही मन में प्रसन्न होता । कभी वो मुझे कुछ खिलाती तो कभी मैं...

वो एक दिन बोली "तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते थे ना । अब तो हम दोस्त हैं न ।"
मैंने कहा "धत, दोस्ती ऐसे थोड़े होती है ।"
"तो कैसे होती है ?"
"गर्ल फ्रेंड तो गाल पर किस करती है ।"
"अच्छा तो लो" और उसने मेरे गाल पर किस कर लिया ।

यारों अपनी तो लाइफ सेट हो गयी । अब वो मेरी गर्ल फ्रेंड बन गयी....

कुछ दिन दोस्ती के अच्छे बीते । साथ झूलना...साथ बैठना...साथ खाना । अब मुझ पर मोनिटरगीरी भी नही दिखाती थी । सब कुछ अच्छा चला । पाँचवी के बाद, मेरे प्यार को किसी की नज़र लग गयी । उसके पिताजी का ट्रांसफर हो गया । वो कहाँ चली गयी ? किस शहर ? पता ही नही चला ।

मेरी मोहब्बत, मेरी दोस्ती का दी एंड हो गया....

पापा ने मुझे दूसरे स्कूल में डाल दिया । जहाँ निरे लड़के ही लड़के भरे पड़े थे । और मैं उनके साथ, उनकी शरारतों में रम गया । हाँ कभी कभी, अपनी गर्ल फ्रेंड की याद आ जाती....जैसे कि आज आ गयी :) :)

Tuesday, 5 October 2010

सर्दियों की धूप में गाँव

दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत हैं । मटर के पौधे शर्मा कर झुक गये हैं । उधर गाजर लाल हुई जा रही है । सुबह की ओस मोती बनकर मेरे पैरों तले आकर अवर्णित सुख दे रही है । मैं चने के पौधे को तोड़ लेता हूँ । कच्चे चने खाने का सुख ले रहा हूँ । चाचू सीटी बजा रहे हैं । मैं कहता हूँ "चाचू मुझे भी सिखाओ ना" । वो कहते हैं "नहीं, गन्दी बात" । वो मेरे लिये फिर भी अच्छे बने रहते हैं । वो हर रोज़ यही बात कहकर टाल जाते हैं । और मैं इस हुनर को सीखना चाहता हूँ, सीटी बजाने का सुख भोगना चाहता हूँ । जब भी उदास हो या खुश तो सीटी गुनगुनाकर दिल बहला लो । कई दिन बीत गये हैं और उन्होंने मुझे अपना शिष्य बना लिया है ।

शाम का वक़्त है और गाँव अँधेरे में गुनगुना रहा है । हम सभी चचा-ताऊ के बच्चे मिटटी के चूल्हे को चारों ओर से घेरे बैठे हैं । माँ गरमा-गरम रोटियाँ बना रही है । कढाई से सब्जी थाली में निकाल कर, उसी में एक ओर रोटी रखकर खाने में आनंद आ रहा है । माँ बीच-बीच में टोक कर कहती है "थोड़ी ठंडी तो होने दे" । मैं फूली हुई रोटी को तोड़कर उसे फूँक-फूँक कर खा रहा हूँ । फिर सोचता हूँ कि माँ कभी-कभी तो बिना चिमटे के रोटी निकाल कर मुझे देती है । और देखो तो मेरी फ़िक्र कर रही है । तब लजीज़ शब्द से परिचित नहीं हूँ किन्तु ऐसा ही कोई शब्द माँ से कह देना चाहता हूँ, उसकी बनायीं हुई रोटियों और सब्जी के बारे में ।

शाम के आठ बजे हैं और गाँव की रात हो गयी है । बुजुर्ग लोग लकड़ियों और उपलों को एकत्रित कर उसमें आग लगाये, चारों ओर बैठे हैं । उनमें से कोई आल्हा-ऊदल को सुना रहा है । इन सबके मध्य में बैठा गर्माते-गर्माते सो गया हूँ और दादा जी बाद में कंधे पर टाँग मुझे खाट पर लिटा आये हैं । कुछ देर बाद माँ उठाकर ले गयी है । पुनः नींद के आगोश में जाने से पहले दूध और गुढ ख़त्म करना होगा । सुबह माँ से पूँछता हूँ "मैं दादा जी के पास से कैसे आया" । माँ कोई जवाब नहीं देती, बस मुस्कुराते हुए मट्ठा फेरने लगती है । मुझे मट्ठे में बाजरे की रोटी और गुढ मिलाकर खाना पसंद है । और माँ को मुझे दही खिलाना । हम दोनों खुश हैं ।

मेरे लिए लकड़ी की पट्टी आ गयी है । उसे हर सुबह घिस-घिस कर चमकाना होता है । खड्डी, दवात और कलम मेरे साथी बन चुके हैं । स्कूल में मास्टर जी लिखना सिखाते हैं । कलम से लिखने पर गीले को सुखाने के लिए धूप दिखा देता हूँ । अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः सीख चुका हूँ । इसके आगे क्या लिखा जाता है ? ये जानने के लिए उत्सुक हूँ किन्तु शेष बच्चे अभी उसी में अटके हैं । मैं पेड़ों पर बैठी चिड़िया को देखने में स्वंय को व्यस्त कर लेता हूँ ।

अबके पिताजी कई दिनों बाद आये हैं । मैं सीटी गुनगुनाना जान गया हूँ । पट्टी को चमकाने से लेकर सभी अक्षरों से परिचित हूँ । पिताजी ने माँ से अबके साथ चलने के लिए कहा है । माँ अपने और हम दोनों भाइयों के कपडे रख रही है । हम खेतों की पगडंडियों से होते हुए मुख्य सड़क तक पहुँच गये हैं ।

मैं बस की खिड़की से बाहर झाँक रहा हूँ । मटर, गाजर, मूली, शकरकंद और चने के खेत एक-एक कर पीछे छूटते जा रहे हैं । याद हो आता है पट्टी, कलम, दवात घर में ही छूट गये । पिताजी बता रहे हैं, अब तुम कॉपी पर लिखोगे । पेड़ों पर से आती धूप आँखों में चुभ रही है । माँ खिड़की बंद कर देती है । गाँव अब नहीं दिखता । बहुत कहीं पीछे छूट गया है.....

Saturday, 2 October 2010

स्मृतियों से वो एक दिन

सन् उन्नीस सौ सतानवे की कोई ठंडी सुबह....

मैं छत पर औंधे पड़े हुए सोचने में मग्न हूँ । सर्दियों की धूप भी कितनी मुलायम होती है । माँ नीचे स्नान कर रही होंगी, उसके बाद पूजा और फिर मुझे पुकारेगी । मैं आवाज़ दूँगा "हाँ माँ, अभी आता हूँ" । हालाँकि तब भी मेरे पास कोई काम नहीं होगा किन्तु देर लगा कर स्वंय का व्यस्त होना जताउँगा । फिर माँ पूँछेंगी "क्या कर रहे थे ?" कब से पुकार रही हूँ और फिर दबी आवाज़ में कहेंगी "ये लड़का भी न जाने कहाँ खोया रहता है" । माँ फिर मेरे सामने नाश्ते की थाली रख देंगी और मेरे खाते समय, मेरे सर पर हाथ फेरेंगी । फिर वो कहेंगी "क्या सोचते रहते हो ?" । मैं खाता रहूँगा और इसी बीच में उत्तर कहीं खो जायेगा । उन्हें उत्तर की प्रतीक्षा नहीं होगी । मैं उठकर आधा गिलास पानी पियूँगा और आधे से हाथ धो लूँगा । माँ के पल्लू से हाथ पौछूँगा और देहरी से बाहर चला जाउँगा ।

करवट लेता हूँ और देहरी से बाहर के संसार में पहुँच जाता हूँ ।

उसका आज जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है । न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।

उसके सख्त निर्देश हैं कि वह अपना जन्म दिन अँग्रेजी तरीके से मनाएगी । इसीलिए कल ही यह बताकर उसने मुझे उलझन में डाल दिया कि वो रात के बारह बजकर एक सेकंड पर मुझे अपने सामने देखना चाहती है । मैं इस बात पर उसकी कम उम्र पर चिढ़ता हूँ । सोचता हूँ कि यदि हम पच्चीस बरस के होते, तो वो कभी ऐसा जोखिम उठाने के लिए नहीं कहती । फिर स्वंय की इस समझदारी पर संतुष्ट सा महसूस करता हूँ ।

रात के दस बज रहे हैं और मेरा दिल घड़ी की टिक-टिक से भी तेज़ आवाज़ कर रहा है । माँ कमरे में दूध का गिलास रखकर चली गयी हैं । जाते जाते कह गयी हैं "सो जाओ और सुबह जल्दी उठकर पढ़ लेना" । उनकी संतुष्टि के लिए लाइट बंद कर देता हूँ । मैं हमेशा सुबह देर से उठता हूँ और माँ हमेशा सुबह जल्दी उठने का बोलकर जाती हैं ।

ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हो गए हैं । उठकर किताबों में दुबके गुलाब को बाहर निकालता हूँ, सिरहाने से गुलाबी कार्ड को हाथों में ले, उसकी छत पर रवाना होने के लिए स्वंय को तैयार करता हूँ । उसने कल रोज़ जाते-जाते दो बार याद दिलाया था कि हम उसकी छत पर मिलेंगे । मैं पहली दफा बिना बताये उसकी छत पर जाने के ख्याल से पसीना-पसीना हुआ जा रहा हूँ ।

अपनी छत से लगी दो छतों को फलाँग कर उसकी छत पर पहुँचता हूँ । ग्यारह बजकर उनसठ मिनट हो गए हैं । वो अभी तक नहीं आई । सूनी पड़ी गलियों में कुत्ते गश्त लगा रहे हैं । आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं । छतों पर हल्की धुंध की चादर तन गयी हैं । दूर से बारह के टनटनाने की आवाज़ आई है । छत पर किसी के आने की आहट, दिल धकधक करने लगा, वो शौल ओढ़े हुए बिलकुल नज़दीक आ गयी । उसे पहचान कर पहली दफा इतनी ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ ।

"हैप्पी बर्थ डे, माय लव" सुनकर वो खिलखिला जाती है । उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर "हैप्पी बर्थ डे" बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । "अच्छा तो अब मैं चलूँ" ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से चिपके हुए हैं । पहली बार उसकी गर्म साँसों और होठों को महसूस कर रहा हूँ ।

"अच्छा तो अब मैं चलूँ" कुछ देर बाद अलग होते हुए फिर से कहता हूँ । अबकी वो मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाती है । मैं पहली छत की दीवार फलाँग कर चलने को होता हूँ । वो अभी भी छत पर है । फिर से लौट पड़ता हूँ । पास आकर "आई लव यू" कहता हूँ । वो मुस्कुरा जाती है और प्रतिउत्तर में "आई लव यू टू" कहती है ।

और फिर वे सभी क्षण स्मृतियों में लॉक हो जाते हैं ....

Friday, 1 October 2010

अख्तर मियाँ

फरवरी की एक अलसाई दोपहर

हवा ग़ज़ल गुनगुना रही हैं, मैं कहीं ख्यालों की सैर पर निकला हुआ हूँ । अख्तर मियाँ आ धमकते हैं । इनका तार्रुफ़ इतना है कि ये शरीफ़ आवारा हैं । शेर हर वक़्त बगल में दबाये घूमते हैं और जो कहीं महफ़िल जम गयी तो साहब चिराग बन उसे रोशन कर देते हैं । 'अमाँ यार' उनका तकिया कलाम है । हाल-चाल पूँछने की इन्हें खास बीमारी है ।

आते ही बिस्तर पर काबिज़ हो जाते हैं ।
-"अमाँ यार" तुम तो ईद के चाँद हुए जा रहे हो । अम्मी तुम्हें याद कर रही थीं ।
-"ह्म्म्म" मैं होश में आता हूँ ।
-ये तो कोई जवाब नहीं हुआ । कहाँ खोये हुए हो ?
-गहरी साँस लेता हूँ ।
-अमाँ ये हो क्या रिया है ? जवानी कहाँ बर्बाद किये बैठे हो । माथे पर हाथ रखते हैं । तबियत तो दुरुस्त मालूम होती है । अब कुछ बकोगे भी या हम ही कुछ फ़रमायें ।
-मैं उनके चेहरे को बात टालने के उद्देश्य से देखता हूँ ।
-वो शेर कहते हैं :
मत पूँछ, कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख, कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे ।

"अब बताओगे भी कि माज़रा क्या है ?" शेर खत्म होते ही वार करते हैं ।

-कुछ नहीं है अख्तर, खामखाँ परेशान ना करो ।
-तो बात यहाँ तक पहुँच गयी । लौंडा बर्बाद हुआ जा रिया है, उनकी याद में । कौन है ? ज़रा हमें भी तो इत्तिला की होती । कुछ ना सही तो दो लफ्ज़ ही सुन लेते ।
-क्या, कौन है ? क्या बातें किये जा रहे हो ?
-वाह मेरे शेर, हम दुनियाँ को बनाते हैं और तुम हमें....खैर जाने दो, हम होते ही कौन हैं ?
-देखो अख्तर मियाँ, ये इमोशनली ब्लैकमेल मत किया करो ।
-तो बताओ, क्या माज़रा है ?
-कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं ।

वो थोड़े गुस्से में आकर झल्लाते हुए उठकर बैठ जाते हैं । इधर उधर निगाह दौडाते हैं । किताबों के दरमियाँ गुलाब बाहर झाँक रहा है । वो फटाक से उठकर वहाँ पहुँचते हैं । गुलाब हाथ में लेते हैं ।

-तो ज़नाब इश्क फरमा रहे हैं ।
-"ऐसा कुछ भी नहीं है" थोडा सकुचाते हुए कहता हूँ ।
-अमाँ तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोई चोरी कर रहे हो । अरे इश्क तो सभी करते हैं । शाहजहाँ ने किया था । अकबर ने किया था । हमारे अब्बू ने किया था । अरे हाँ अब्बू से याद आया । वैसे मामला कहाँ तक पहुँचा ?
-"क्यों, तुम्हारे अब्बू कहाँ से आ गये इसमें ?" मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ ।
-अब्बू तो नहीं आये, मगर हम जरुर आ गये ।
-ऐसा कुछ नहीं है यार ।

वो शेर कहते हैं :
तेरे वादे पे जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता ।

-देखो हमें नदीम ने सब बता दिया है ।
-"क्या बता दिया है ?" फिर से अंजान बनते हुए कहता हूँ ।
-यही कि तुम अंग्रेजी ट्यूशन के बहुत चक्कर लगा रहे हो । और जहाँ तक तुम्हारी अँग्रेजी का सवाल है, वो इतनी भी बुरी नहीं मालूम होती हमें ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-तो किला फतह कर लिया, मालूम होता है ।

कुर्ते की जेब से कागज़ निकालता हूँ । उन्हें पेश करता हूँ । वो लपक के पढने लगते हैं ।
-वाह, ख़त का दौर चल निकला और तुम अब बता रहे हो ।
-मैं बताने ही वाला था ।
-और अभी कुछ वक़्त पहले क्या हो रिया था ?
-अरे वो तो तुम्हें बना रहा था ।
-वाह मियाँ । पूरे आगरे में तुम्हें हम ही मिले हैं बनाने के लिए ।
-मैं मुस्कुरा देता हूँ ।

वो शेर कहते हैं :
इश्क पर जोर नहीं, है यह आतश ग़ालिब
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने ।

स्मृतियों में अख्तर मियाँ की बातें आज भी खुशबू फैलाती हैं । ना मालूम इन दिनों, किस शहर में होंगे अख्तर मियाँ....
 

हसरतसंज © 2008. Template Design By: SkinCorner