Thursday, 30 September 2010

तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

-सुनो आँखें बंद करो ।
-क्यों ?
-अरे बंद करो ना ।
-पहले बताओ फिर ।
-आँखें बंद करने पर मैं तुम्हें कहीं ले चलूँगा ।
-कहाँ ?
-"ओह हो" कहता हुआ मैं उसकी आँखों पर अपनी नर्म हथेलियाँ रख देता हूँ ।

अब मैं तुम्हें अपनी पसंदीदा जगह पर ले जा रहा हूँ ।


अपने घर के पीछे का दरवाजा खोलते ही तुम अपने पैरों तले बिछी हरी घास पर दौड़ रही हो । उन पर बिखरी हल्की-हल्की ओंस की बूँदें ऐसे चमक रही हैं, जैसे मोती । दूर-दूर तक फैला हुआ नीला आसमान है । और उस पर अपनी खूबसूरती बिखेरता इन्द्रधनुष ऐसा लग रहा है मानों उसने अभी अभी होली खेली हो । उसे देखते ही तुम दौडी-दौडी आकर मेरा हाथ पकड़ लेती हो और कहती हो "वो देखो इन्द्रधनुष, कितना प्यारा है ना" । तुम खिलखिला कर हँस रही हो, बिलकुल मासूम, उज्जवल हँसी । जिसमें तुम शामिल हो, मैं शामिल हूँ और तुमने उसमें इन्द्रधनुष के रंग कब शामिल कर लिए मुझे पता ही नहीं चला ।

हरी घास के एकतरफ बनी हुई पगडंडियों पर तुम नंगे पैर दौडे जा रही हो और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ । डर रहा हूँ कहीं तुम गिर ना जाओ । किन्तु तुम यूँ लग रही हो जैसे हवा ने तुम्हारा साथ देना शुरू कर दिया है । राह में वो सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा तमाम रंग-बिरंगे गुब्बारे लेकर खड़े हुए हैं । हरे, लाल, पीले, गुलाबी, नीले, हर रंग में रंगे हुए गुब्बारे । तुम उन्हें देखकर ऐसे खुश हो रही हो जैसे एक मासूम बच्ची हो । उन गुब्बारों में एक रंग मुझे तुम्हारा भी जान पड़ता है, मासूमियत का रंग या शायद प्यार का रंग या फिर ख़ुशी का रंग ।

जानता हूँ तुम्हें वो गुब्बारे चाहिए इसी लिए पास आकर मेरा हाथ पकड़ कर चल दी हो । गुब्बारे मिल जाने पर तुम कैसे दौडी-दौडी जा रही हो । और एक ही पल में तुमने उन गुब्बारों को छोड़ दिया है, एकदम स्वतंत्र । किसी पंक्षी की तरह वो उडे जा रहे हैं या शायद तुम्हारी तरह, ना जाने किस देश । और पास आकर तुम जब ये पूँछती हो कि "ये उड़ कर कहाँ जाते हैं ?" मैं बस मुस्कुरा कर रह जाता हूँ । तुम कहती हो "बोलो ना" । मेरी मुस्कराहट देखकर तुम फिर बाहें फैलाये दौड़ने लगती हो ।

आगे तुम्हें सेब का बाग़ दिख जाता है और तुम दौड़ती हुई उसमें चली जाती हो । कहीं छुप कर मुझे आवाज़ देती हो "कहाँ हूँ मैं ?" और फिर तुम्हारी खिलखिलाती हँसी गूँज जाती है । एकदम से पंक्षियों के चहचहाने की आवाज़ में घुली सी लगती है तुम्हारी हँसी । तुम पेडों की ओट में छुपी हुई बार-बार मुझे आवाज़ देती हो । कभी इस पेड़ के पीछे तो कभी उस पेड़ के पीछे । जानता हूँ तुम्हें लुका-छुपी का खेल बहुत पसंद है । मेरे थक जाने पर कैसे अचानक से, पीछे से आकर तुम मुझे अपनी बाहों में थाम लेती हो और मेरे सीने से लग जाती हो । मैं तुम्हें बाहों में लेकर हवा में झुलाता हूँ । फिर तुम सेब तोड़ कर पहले खुद चखती हो और मुझे देती हो कि "खाओ बहुत मीठा है" ।

पास ही बह रही नदी जो ना जाने कहाँ दूर से चली आ रही है और ना जाने कहाँ जा रही है । शायद कुछ गाती सी, गुनगुनाती सी । पास ही की उस बैंच पर तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले जाती हो और उस पर बैठते ही तुम मेरे कंधे पर अपने सर को रख लेती हो । हम बहुत देर तक खामोश रह नदी के बहने को देखते रहते हैं । पानी में उसके अन्दर के छोटे-छोटे पत्थर साफ़ दखाई दे रहे हैं । रंग-बिरंगी मछलियों को देखकर तुम्हारे लवों पर मुस्कान बिखर गयी है । जिनसे तुम्हारे लवों की मिठास बढ़ गयी सी लगती है ।

हम यूँ ही घंटो खामोश रह एक दूसरे से बातें करते रहे । फिर तुम कहती हो कि तुम्हें नदी में नहाना है । मैं तुम्हें मना नहीं कर सकता, ये तुम जानती हो । जानता हूँ भीगने पर तुम्हें सर्दी भी लग सकती है । तुम नदी के पानी में चली जाती हो । तुम भीग चुकी हो और हाथ देकर मुझे बुलाने लगती हो "आओ ना" । और हम दोनों बहुत देर तक उसमें नहाते रहते हैं । आस-पास के पेडों पर से पंक्षी हमारा नहाना देख रहे हैं । उन पर नज़र जाते ही तुम शरमा जाती हो और मेरे सीने से लग जाती हो । उन पलों में तुम्हारे लवों की मिठास का मुझे एहसास होता है । हमारी साँसे एक दूसरे में घुल सी जाती हैं ।

पास के ही पत्थरों से बने टीले पर सूरज गुनगुनी धूप देकर जा रहा है । शायद कहीं से इकट्ठी कर कर लाता हो । हम अपने-अपने कपडों को उस गुनगुनी धूप में, पत्थरों पर सूखने के लिए छोड़ देते हैं । उतनी प्यारी गुनगुनी धूप में लेटने का हम आनंद ले रहे हैं । पास ही में रखे हुए रंगों से तुम रंगोली बनाने लग जाती हो और बार बार मुझे मुस्कुरा कर देखती हो । मेरे कहने पर कि "क्या देख रही हो" । तुम कहती हो कि "तुम्हारी आँखों से ख्वाब चुरा कर उनमें रंग भर रही हूँ । मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।

हमारे कपडे सूख जाने पर हम वहाँ से चल देते हैं । सूरज डूबने लगता है । वो दूर नदी में डूबता सा प्रतीत होता है । तुम मुझसे पूंछने लगती हो "क्या सूरज नदी में रहता है?" मैं डूबते सूरज को एक बार फिर देखता हूँ और तुम्हारे हाथों को थाम कर वापस चल देता हूँ । रास्ते में खड़े वही बाबा अबकी बार आइस क्रीम बेच रहे हैं । तुम पगडंडियों पर दौड़ती हुई उनके पास पहुँचती हो । मेरे कहने पर कि तुम्हें सर्दी लग जायेगी । तुम आइस क्रीम लेने के लिए जिद करती हो ।

कुछ दूर हम दोनों आइस क्रीम खाते हुए चले जा रहे हैं । वापसी में हमें गुलाबों से भरा बगीचा मिलता है । मैं जब गुलाब को तोड़ने लगता हूँ तो तुम पूंछती हो कि "गुलाब को दर्द तो नहीं होगा ?" मैं ना में सर हिलाता हूँ । साथ चलते चलते मैं तुम्हारे बालों में गुलाब लगा देता हूँ । तुम मुस्कुराते हुए मेरी आँखों में झांकती हो ।

चलते-चलते फिर से तुम खिलखिला जाती हो । ढेर सारी रंग बिरंगी-तितलियाँ वहाँ से गुजरती हुई जा रही हैं । तुम्हारे चारों ओर से आकर कुछ कह रही हैं । शायद सूरज के डूबने पर अपने घरों को जा रही हैं और तुमसे ख़ास तौर पर अलविदा कहने चली आई हैं । तुम एक तितली को अपनी हथेली पर बैठा कर कुछ बोलती हो । शायद अलविदा ही कहा होगा ।

खुशियाँ बिखेरती हुई तितलियाँ अपने अपने घरों को चली जाती हैं । तुमने मेरा हाथ फिर से पकड़ लिया है और हम चहलकदमी करते हुए अपने दरवाजे तक पहुँच गए हैं । फिर तुम अचानक से मेरे गाल को चूम कर दरवाजा खोलकर अन्दर चली जाती हो । मैं मुस्कुराता हुआ तुम्हारे साथ आ जाता हूँ ।

सुबह उठ कर तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख कर बोल रही हो "कहाँ ले गए थे मुझे" । और मैं तुम्हारे बालों को चूमकर कहता हूँ "हमारी पसंदीदा जगह" । तुम मुस्कुरा जाती हो ।

* (इस पोस्ट का सही स्थान शायद यही है । अतः पुनः प्रकाशित कर दिया ।)

Tuesday, 28 September 2010

सुकून

बीते हुए दिनों के अँधेरे जंगल से निकल, उजले वर्तमान का सुख सुकून नहीं देता । वो बंद पुराने बक्से में पड़ी जर्ज़र डायरी के सफहों में सुरक्षित अवश्य होगा । उसे छुआ जा सकता है किन्तु पाया नहीं जा सकता । वक़्त-बेवक्त सूखी स्याही को आँसुओं से गीला करना दिल को तसल्ली देना भर है । इससे ज्यादा और कुछ नहीं ।

तुम भी दो सौ गज की छत पर कपड़ों को सुखाकर, कौन सा सुकून हासिल कर लेती होगी । रात के अँधेरे में, बिस्तर की सलवटों के मध्य, थकी साँसों के अंत में क्षणिक सुख मिल सकता है । सुकून फिर भी कहीं नहीं दिखता । और फिर ये जान लेना कि मन को लम्बे समय तक बहलाया नहीं जा सकता । बीते वक़्त के सुखद लम्हों में तड़प की मात्रा ही बढ़ाता है । जानता हूँ उस पछताने से हासिल कुछ भी नहीं ।

वैज्ञानिक दावों को मानते हुए कि इंसान के जिंदा रहने के लिये साँसों को थकाना अति आवश्यक है की तर्ज़ पर भविष्य के साथी को भोगने से भी संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता । और फिर उसकी उम्मीदों पर खरा उतरते उतरते स्वंय के होने को बचाए रखना भी कम कलाकारी नहीं होगी । ये बात अलग है कि उस कला के लिये पुरस्कार वितरित नहीं होते । अन्यथा उस खेल के एक से एक बड़े खिलाड़ी संसार में मौजूद हैं । मैं तो कहीं ठहरता भी नहीं ।

एटीएम और क्रेडिट कार्ड पर खड़े समाज में ठहाकों के मध्य कभी तो तुम्हारा दिल रोने को करता होगा । दिखावे के उस संसार में क्या तुम्हारा दम नहीं घुटता होगा । चमकती सड़कों, रंगीन शामों और कीमती कपड़ों के मध्य कभी तो तुम्हें अपना गाँव याद आता होगा । कभी तो दिल करता होगा कच्चे आम के बाग़ में, एक अलसाई दोपहर बिताने के लिए । कभी तो स्मृतियों में एक चेहरा आकर बैचेन करता होगा ।

फिर भी अगर तुम्हें कहीं सुकून बहता दिखे, तो एक कतरा मेरे लिए भी सुरक्षित रखना । शायद कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए । वैसे भी, अभी भी कुछ उधार बनता है तुम पर ।

Monday, 27 September 2010

उसकी होम साइंस

मैं फिजिक्स का विद्यार्थी हूँ और होम साइंस की किताब चुपके से पढ़ रहा हूँ । पढने के बाद अंगडाई लेता हूँ जैसे हवाई जहाज कैसे बनता है, जान लिया हो । बाहर देहरी पर दस्तक हुई है, चुपके से किताब को यथास्थान रख देता हूँ और फिजिक्स के डेरीवेशन की किसी पंक्ति पर लटक जाता हूँ ।

बाहर मनु और उसमें कुछ खुसर-पुसर हो रही है, फिर खी-खी की आवाज़ । उठता हूँ और जाकर घड़े से गिलास भर पानी, बूँद-बूँद पीता हूँ । चोर निगाहों से उसे देखता हूँ । पकड़ा जाता हूँ और मुस्कुराकर छोड़ दिया जाता हूँ । रिहा होकर फिजिक्स के बगीचे में चला जाता हूँ ।

जानता हूँ, अब वो कहेगी "अच्छा मनु, अब मैं चलती हूँ वरना माँ डाँटेगी", देहरी के बाहर निकलेगी, वापस मुड़ेगी और मेरे बगीचे में आकर होम साइंस का जहाज उड़ा कर चली जायेगी" । दो बार में अपनी किताब लेकर जाने की उसकी छह महीने पुरानी आदत है ।

आज मनु, माँ के साथ बाहर गयी है । मैं सर्किल के सवालों की परिधि में हूँ । बाहर निकलता हूँ, एक और सर्किल, और फिर दो आँखें बना रहा हूँ, एक नाक और बाल खराब हो गये । "देखा, कर दिये ना खराब" देहरी पर वो खड़ी मुस्कुरा रही है ।

-उसके पूँछने से पहले जवाब देता हूँ"मनु तो बाहर गयी है" ।
-"अच्छा, मुझे नहीं पता था " कहते हुए मेरा बुद्धू होना जताती है ।
-मेरे पास शब्द नहीं ।
-"गाज़र का हलुआ लेकर आयी थी । मनु के लिये, तुम मत खाना ।" बाद के शब्द प्यार से बोलती है ।

टिफिन रखती है और चल देती है । मुड़कर वापस आती है "अच्छा वैसे किसकी शक्ल बिगाड़ने की कोशिश थी" । मैं शरमा जाता हूँ । "देखो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा है" कहती हुई बैठ जाती है । मैं गणितज्ञ होने की कोशिश में लग जाता हूँ । वो होम साइंस के शस्त्र निकाल लेती है ।

-अच्छा तुम ऐसे हो या बनने की कोशिश करते हो ?
-चुप्पी, कोई जवाब नहीं ।

वो हाथ से पैन छीन लेती है ।
- "नम्रता" पहली बार उसके सामने उसका नाम लेकर बनने की कोशिश करता हूँ ।
-"हाँ, नम्रता, फिर आगे, आगे कुछ" वो देखकर मुस्कुरा रही है ।
-यू आर टू मच
-यस, आई एम
-पैन दो
-बस, पैन के लिये इतने नाटक ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-बुद्धुराम, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता ।

वो उठती है । पैन फैंक कर देती है "लो रखो इसे सीने से लगाकर" । चल देती है । देहरी के बाहर पहुँच कर याद दिलाती है "हलुआ तुम्हारे लिये ही लायी थी, मनु सुबह खा चुकी है" ।

कमरे में उसकी खुशबु घुल सी गयी है । लम्बी साँस लेता हूँ और सर्किल बनाकर रुक जाता हूँ । याद हो आता है, उसे उसका चेहरा बहुत प्यारा है । सोचकर मुस्कुरा उठता हूँ , हमारी पसंद कितनी मिलती है ।

फिर से सर्किल की परिधि पर घूम रहा हूँ, राउंड एंड राउंड एंड राउंड....
 

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